भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (सेबी) ने सोमवार को संबंधित पक्ष लेनदेन (आरपीटी) से जुड़े नियमों में व्यापक बदलाव का प्रस्ताव रखा है। इसका उद्देश्य देश की शीर्ष सूचीबद्ध कंपनियों के लिए व्यापार करने की सुगमता को बढ़ाना है।
सेबी द्वारा जारी परामर्श पत्र में “पैमाना-आधारित सीमा तंत्र” (scale-based threshold mechanism) का सुझाव दिया गया है, जिसके तहत यह तय किया जाएगा कि कौन से आरपीटी “महत्वपूर्ण” माने जाएंगे और किन्हें शेयरधारकों की मंजूरी के लिए प्रस्तुत किया जाना अनिवार्य होगा। वर्तमान नियमों के अनुसार, यदि कोई आरपीटी ₹1,000 करोड़ या कंपनी के वार्षिक समेकित कारोबार के 10% (जो भी कम हो) से अधिक होता है, तो उसे शेयरधारकों की मंजूरी लेनी होती है। प्रस्तावित बदलावों से देश की शीर्ष सूचीबद्ध कंपनियों के लिए अनुपालन से जुड़ी बाधाएं लगभग 60% तक कम हो सकती हैं।
परामर्श पत्र में यह भी कहा गया है कि किसी वार्षिक आम सभा (AGM) में पारित ओम्निबस आरपीटी की मंजूरी अगले एजीएम की तिथि तक, अधिकतम 15 महीनों तक वैध रहेगी। वहीं अन्य शेयरधारक बैठकों में दी गई मंजूरी एक वर्ष तक वैध मानी जाएगी।
इसके अतिरिक्त, सेबी ने स्पष्ट किया है कि खुदरा खरीददारी (retail purchases) से संबंधित छूट केवल सूचीबद्ध संस्थाओं या उनकी सहायक कंपनियों के निदेशकों, प्रमुख प्रबंधन अधिकारियों (KMPs) या उनके रिश्तेदारों पर लागू होगी। साथ ही यह भी स्पष्ट किया गया कि होल्डिंग कंपनियों और सहायक कंपनियों के बीच लेनदेन को दी जाने वाली छूट केवल सूचीबद्ध होल्डिंग कंपनियों के लिए ही मान्य होगी।
