भारतीय रुपया लगातार दबाव में है और बुधवार को अमेरिकी डॉलर के मुकाबले अपने अब तक के सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। बढ़ते विदेशी निवेश निकासी (foreign outflows), ऊंची कच्चे तेल की कीमतों और पश्चिम एशिया संकट के कारण भारतीय मुद्रा पर दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। बुधवार को रुपया 95.7950 प्रति डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर तक फिसल गया, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए चिंता का संकेत माना जा रहा है।
विशेषज्ञों के अनुसार, भारतीय रुपये में गिरावट की सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल है। पश्चिम एशिया में अमेरिका-ईरान तनाव और हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में बाधा के कारण वैश्विक तेल आपूर्ति प्रभावित हुई है, जिससे ब्रेंट क्रूड की कीमतों में लगभग 50% तक बढ़ोतरी दर्ज की गई है। भारत अपनी 90% से अधिक कच्चे तेल की जरूरत आयात के जरिए पूरी करता है, इसलिए तेल कीमतों में वृद्धि सीधे तौर पर रुपये और चालू खाता घाटे (Current Account Deficit) पर असर डालती है।
इसके अलावा, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) द्वारा भारतीय बाजार से लगातार पूंजी निकासी ने भी रुपये की कमजोरी बढ़ाई है। रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2026 में अब तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय बाजारों से 20 अरब डॉलर से ज्यादा निकाले हैं, जिससे डॉलर की मांग बढ़ी और रुपये पर अतिरिक्त दबाव बना।
हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) बाजार में हस्तक्षेप कर रुपये को स्थिर करने की कोशिश कर रहा है। सरकारी बैंकों के जरिए डॉलर बेचकर RBI ने गिरावट को कुछ हद तक नियंत्रित किया है। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि अगर तेल कीमतें ऊंची बनी रहती हैं, तो RBI को और कड़े कदम उठाने पड़ सकते हैं।
RBI गवर्नर संजय मल्होत्रा ने भी संकेत दिए हैं कि यदि महंगाई का दबाव लगातार बढ़ता है, तो केंद्रीय बैंक को मौद्रिक नीति में हस्तक्षेप करना पड़ सकता है। हालांकि फिलहाल RBI ब्याज दरों में बदलाव को अंतिम विकल्प के रूप में देख रहा है।
सरकार ने विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव कम करने के लिए सोना और चांदी के आयात शुल्क में बढ़ोतरी जैसे कदम भी उठाए हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी हाल ही में ईंधन बचत और विदेशी मुद्रा संरक्षण के लिए कई अपीलें की हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक तेल कीमतों में नरमी नहीं आती और विदेशी निवेश वापस नहीं लौटता, तब तक रुपये पर दबाव बना रह सकता है। कई वैश्विक संस्थानों ने अनुमान लगाया है कि वर्ष के अंत तक डॉलर-रुपया विनिमय दर 96.80 तक पहुंच सकती है।
कुल मिलाकर, रुपये का रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंचना भारत के लिए आर्थिक चुनौती का संकेत है। आने वाले हफ्तों में तेल बाजार, वैश्विक तनाव और RBI की रणनीति भारतीय मुद्रा की दिशा तय करेंगे।