भारत के खेल प्रशासन से जुड़ी एक अहम खबर सामने आई है, जहां Delhi High Court ने Hockey India और उसके महासचिव Bhola Nath Singh को अदालत की अवमानना (Contempt of Court) का दोषी ठहराया है। यह फैसला खेल संगठनों की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर गंभीर सवाल खड़े करता है।
अदालत ने पाया कि महासचिव ने जानबूझकर कोर्ट के आदेशों का पालन नहीं किया। मामला उस समय शुरू हुआ जब सैयद आसिमा अली, जो खुद को हॉकी इंडिया की निर्वाचित उपाध्यक्ष बताती हैं, ने अदालत का रुख किया। उन्होंने आरोप लगाया कि उन्हें कार्यकारी बोर्ड की बैठकों में शामिल होने से रोका गया, जबकि अदालत पहले ही इस संबंध में स्पष्ट निर्देश दे चुकी थी।
दिल्ली हाई कोर्ट ने 17 जनवरी 2025 को आदेश दिया था कि आसिमा अली को सभी एग्जीक्यूटिव बोर्ड मीटिंग्स में शामिल होने के लिए लिंक उपलब्ध कराया जाए, ताकि वह निर्णय प्रक्रिया का हिस्सा बन सकें। हालांकि, आरोप है कि जुलाई 2025 में हुई दो अहम बैठकों—4 जुलाई और 27 जुलाई—में उन्हें शामिल नहीं किया गया।
अदालत ने इस पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा कि कोर्ट के आदेशों की अवहेलना किसी भी संस्था के लिए गंभीर मामला है, खासकर तब जब वह संस्था सरकारी मान्यता प्राप्त हो और सार्वजनिक धन से संचालित होती हो। कोर्ट ने इसे “प्रशासनिक पाप” (administrative sin) तक करार दिया।
मामले की सुनवाई के दौरान महासचिव की ओर से बिना शर्त माफी भी पेश की गई, लेकिन अदालत ने इसे स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि माफी केवल औपचारिकता नहीं होनी चाहिए, बल्कि उसमें वास्तविक पछतावा झलकना चाहिए। इस मामले में अदालत को ऐसा नहीं लगा कि माफी ईमानदारी से दी गई है।
हॉकी इंडिया की ओर से यह दलील दी गई कि आसिमा अली की मान्यता उनके राज्य इकाई द्वारा वापस ले ली गई थी, इसलिए उन्हें बैठकों में शामिल नहीं किया गया। लेकिन अदालत ने इस तर्क को खारिज करते हुए कहा कि उसके आदेश में ऐसा कोई शर्त नहीं था और किसी भी पक्ष को अपने हिसाब से आदेश की व्याख्या करने का अधिकार नहीं है।
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि आदेश को लेकर कोई भ्रम था, तो संबंधित पक्ष को अदालत से स्पष्टीकरण मांगना चाहिए था, न कि अपने स्तर पर निर्णय लेना चाहिए था।
अब यह मामला सजा (sentencing) के लिए अगली सुनवाई में जाएगा, जो 4 मई को निर्धारित की गई है। अदालत ने आरोपियों को यह अवसर भी दिया है कि वे अपनी गलती सुधारने के लिए कदम उठाएं।
कुल मिलाकर, यह फैसला न केवल हॉकी इंडिया बल्कि सभी खेल संगठनों के लिए एक महत्वपूर्ण संदेश है कि अदालत के आदेशों का पालन करना अनिवार्य है। यह केस खेल प्रशासन में पारदर्शिता और जवाबदेही की आवश्यकता को भी उजागर करता है।

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