कॉर्पोरेट भारत में लैंगिक असमानता को लेकर एक चिंताजनक तस्वीर सामने आई है। एक हालिया अध्ययन के अनुसार, National Stock Exchange of India में सूचीबद्ध लगभग 48% कंपनियों में एक भी महिला प्रमुख प्रबंधन पद (की मैनेजमेंट) पर नहीं है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि उच्च वेतन और निर्णय लेने वाले पदों पर महिलाओं की भागीदारी अभी भी बेहद सीमित है।

रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि अधिकांश कंपनियों के बोर्ड में महिलाओं की संख्या बेहद कम है। बहुत ही कम ऐसी कंपनियां हैं जहां बोर्ड में दो से अधिक महिलाएं शामिल हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि कॉर्पोरेट गवर्नेंस के उच्च स्तर पर भी महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं मिल रहा है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह स्थिति केवल समान अवसरों की कमी को नहीं दर्शाती, बल्कि यह भी संकेत देती है कि महिलाएं उच्च वेतन वाली नौकरियों में पीछे रह जा रही हैं। नेतृत्व स्तर पर कम प्रतिनिधित्व का सीधा असर उनके करियर ग्रोथ और सैलरी स्ट्रक्चर पर पड़ता है।

कॉर्पोरेट सेक्टर में विविधता और समावेशन (diversity and inclusion) को बढ़ावा देने की बातें लंबे समय से की जा रही हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर बदलाव की गति धीमी है। कंपनियों में महिलाओं को नेतृत्व भूमिकाओं में लाने के लिए ठोस नीतियों और प्रभावी कार्यान्वयन की आवश्यकता है।

यह भी देखा गया है कि जिन कंपनियों में महिलाओं की भागीदारी अधिक होती है, वहां निर्णय लेने की प्रक्रिया अधिक संतुलित और प्रभावी होती है। ऐसे संगठनों में इनोवेशन और प्रदर्शन के बेहतर परिणाम भी सामने आते हैं।

इस परिदृश्य में यह जरूरी हो जाता है कि कंपनियां केवल नियमों के पालन तक सीमित न रहें, बल्कि सक्रिय रूप से महिलाओं को नेतृत्व के अवसर प्रदान करें। मेंटरशिप, स्किल डेवलपमेंट और समान वेतन जैसी पहल इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं।

सरकार और नियामक संस्थाएं भी इस दिशा में कदम उठा रही हैं, लेकिन असली बदलाव तभी संभव है जब कॉर्पोरेट संस्कृति में व्यापक सुधार हो। महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने से न केवल सामाजिक संतुलन बनेगा, बल्कि आर्थिक विकास को भी नई दिशा मिलेगी।

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