भारत और जाम्बिया के बीच क्रिटिकल मिनरल्स (महत्वपूर्ण खनिज) को लेकर चल रही बातचीत फिलहाल ठहर गई है, जिससे भारत की वैश्विक संसाधन रणनीति को झटका लग सकता है। ताज़ा रिपोर्ट के अनुसार, दोनों देशों के बीच माइनिंग राइट्स (खनन अधिकार) पर सहमति नहीं बन पाने के कारण यह वार्ता अटक गई है।
सूत्रों के मुताबिक, भारत को पिछले साल जाम्बिया में लगभग 9,000 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में खनिजों की खोज के लिए आवंटन मिला था। इस क्षेत्र में कोबाल्ट और कॉपर जैसे अहम खनिज मौजूद हैं, जो इलेक्ट्रिक व्हीकल बैटरियों, मोबाइल फोन और पावर सेक्टर के लिए बेहद जरूरी माने जाते हैं।
भारत ने इस परियोजना के तहत भूवैज्ञानिकों की एक टीम भी भेजी थी, जिसने शुरुआती सर्वेक्षण पूरा कर लिया और खनिजों के सैंपल भी जुटाए। यह तीन साल का एक्सप्लोरेशन प्रोग्राम था, जिसके बाद भारत निजी कंपनियों को निवेश के लिए आमंत्रित करने की योजना बना रहा था। हालांकि, इसके लिए जाम्बिया की ओर से स्पष्ट माइनिंग अधिकारों की गारंटी जरूरी थी, जो अब तक नहीं मिल पाई है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, यह साफ नहीं है कि जाम्बिया माइनिंग राइट्स को लेकर आश्वासन देने में देरी क्यों कर रहा है। वहीं भारत अब इस वार्ता को फिर से शुरू करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन फिलहाल स्थिति अनिश्चित बनी हुई है।
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब भारत वैश्विक स्तर पर क्रिटिकल मिनरल्स की आपूर्ति सुरक्षित करने के लिए सक्रिय रूप से काम कर रहा है। सरकार अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया और लैटिन अमेरिका जैसे संसाधन-समृद्ध क्षेत्रों में साझेदारी तलाश रही है, ताकि चीन जैसे देशों पर निर्भरता कम की जा सके।
दरअसल, भारत में कॉपर और कोबाल्ट की मांग तेजी से बढ़ रही है। आंकड़ों के अनुसार, 2025 तक भारत का कॉपर आयात 1.2 मिलियन टन तक पहुंच गया है, जबकि कोबाल्ट के आयात में भी लगातार वृद्धि हो रही है। यह स्थिति देश को वैश्विक सप्लाई चेन के उतार-चढ़ाव के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती है।
विशेषज्ञों का मानना है कि क्रिटिकल मिनरल्स भविष्य की अर्थव्यवस्था के लिए बेहद महत्वपूर्ण हैं, खासकर जब दुनिया इलेक्ट्रिक वाहनों, रिन्यूएबल एनर्जी और डिजिटल टेक्नोलॉजी की ओर तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में इन संसाधनों तक पहुंच सुनिश्चित करना हर देश की प्राथमिकता बन चुका है।
हालांकि, भारत-जाम्बिया वार्ता में आई यह रुकावट दिखाती है कि अंतरराष्ट्रीय खनन समझौते आसान नहीं होते। इसमें न केवल आर्थिक बल्कि राजनीतिक और कानूनी पहलुओं को भी संतुलित करना पड़ता है।
कुल मिलाकर, माइनिंग राइट्स को लेकर बनी अनिश्चितता ने भारत की इस महत्वपूर्ण परियोजना को फिलहाल रोक दिया है। आने वाले समय में यह देखना अहम होगा कि क्या दोनों देश किसी समझौते पर पहुंच पाते हैं या भारत को वैकल्पिक स्रोतों की तलाश करनी पड़ेगी।