भारत की दिग्गज दवा कंपनी Sun Pharma अपनी $12 अरब (करीब ₹1 लाख करोड़) की Organon अधिग्रहण डील को पूरा करने के लिए कई फंडिंग विकल्पों पर विचार कर रही है। यह डील भारतीय फार्मा सेक्टर की अब तक की सबसे बड़ी विदेशी खरीद में से एक मानी जा रही है, जिससे कंपनी का वैश्विक विस्तार तेजी से बढ़ेगा।
रिपोर्ट के अनुसार, Sun Pharma इस अधिग्रहण के लिए अलग-अलग वित्तीय रणनीतियों का मूल्यांकन कर रही है। कंपनी Organon के मौजूदा बॉन्डहोल्डर्स से सहमति लेकर उनके निवेश को Sun Pharma के कर्ज में बदलने का विकल्प भी देख रही है। इसके अलावा, कंपनी यूरो-डिनॉमिनेटेड बॉन्ड जारी करने की योजना पर भी काम कर रही है, जिससे उसे बेहतर क्रेडिट रेटिंग और कम लागत पर फंडिंग मिल सकती है।
इस डील का कुल मूल्य लगभग $11.75 से $12 अरब के बीच बताया गया है, जो इसे भारतीय कंपनियों द्वारा की गई सबसे बड़ी विदेशी अधिग्रहणों में शामिल करता है। इस सौदे के तहत Sun Pharma अमेरिकी कंपनी Organon का पूर्ण अधिग्रहण करेगी, जिससे उसे महिलाओं के स्वास्थ्य (women’s health) और बायोसिमिलर्स जैसे महत्वपूर्ण क्षेत्रों में मजबूत उपस्थिति मिलेगी।
फंडिंग स्ट्रक्चर की बात करें तो कंपनी पहले ही संकेत दे चुकी है कि वह इस डील के लिए आंशिक रूप से अपने कैश रिजर्व का इस्तेमाल करेगी। अनुमान के मुताबिक, Sun Pharma करीब $2 से $2.5 अरब अपनी नकदी से लगाएगी, जबकि शेष $9 अरब से अधिक रकम बैंक लोन और अन्य वित्तीय साधनों के जरिए जुटाई जाएगी।
इसके अलावा, कंपनी ऑफशोर लोन के जरिए $3 से $4 अरब तक जुटाने की भी योजना बना रही है, जिससे फंडिंग का संतुलन बनाए रखा जा सके। इस तरह Sun Pharma एक मल्टी-सोर्स फंडिंग मॉडल अपना रही है, ताकि कर्ज का बोझ नियंत्रित रहे और वित्तीय जोखिम कम हो।
विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी बड़ी डील के लिए फंडिंग का सही संतुलन बेहद जरूरी है। अगर कर्ज ज्यादा बढ़ता है तो कंपनी की बैलेंस शीट पर दबाव पड़ सकता है। हालांकि, लंबे समय में यह अधिग्रहण Sun Pharma के लिए फायदेमंद साबित हो सकता है, क्योंकि इससे कंपनी का राजस्व और वैश्विक पहुंच काफी बढ़ जाएगी।
Organon का अधिग्रहण Sun Pharma को 140 से अधिक देशों में मौजूदगी और 70 से ज्यादा प्रोडक्ट्स तक पहुंच देगा। इससे कंपनी का पोर्टफोलियो मजबूत होगा और वह वैश्विक फार्मा बाजार में एक बड़ी खिलाड़ी बन सकती है।
कुल मिलाकर, Sun Pharma की यह $12 अरब की डील न केवल भारत के फार्मा सेक्टर के लिए ऐतिहासिक है, बल्कि यह दिखाती है कि भारतीय कंपनियां अब वैश्विक स्तर पर बड़े अधिग्रहण करने में सक्षम हो चुकी हैं। हालांकि, इस डील की सफलता काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगी कि कंपनी अपने फंडिंग स्ट्रक्चर और कर्ज प्रबंधन को कितनी कुशलता से संभालती है।