भारत के पोत, नौवहन और जलमार्ग मंत्रालय ने समुद्री और शिपबिल्डिंग क्षेत्र में कौशल विकास को बढ़ावा देने के लिए दक्षिण कोरिया की एक प्रमुख अंतरराष्ट्रीय एजेंसी के साथ एक महत्वपूर्ण समझौता किया है। इस समझौते के तहत दोनों देश मिलकर भारत में इस क्षेत्र के लिए एक मजबूत और कुशल कार्यबल तैयार करने की दिशा में काम करेंगे।
2 अप्रैल को हस्ताक्षरित इस कार्यान्वयन योजना का मुख्य उद्देश्य शिपबिल्डिंग और मरीन सेक्टर में कार्यबल की वर्तमान स्थिति का आकलन करना, कौशल की कमी की पहचान करना और मानव संसाधन विकास के लिए एक स्पष्ट रोडमैप तैयार करना है। इसके माध्यम से यह सुनिश्चित किया जाएगा कि उद्योग की जरूरतों के अनुरूप प्रशिक्षित और सक्षम मानव संसाधन उपलब्ध हो सके।
इस सहयोग के तहत विभिन्न विशेषज्ञ संस्थान और हितधारक भारत के शिपबिल्डिंग और मरीन इंजीनियरिंग उद्योगों पर विस्तृत अध्ययन करेंगे। इस शोध के आधार पर ऐसे प्रशिक्षण कार्यक्रम विकसित किए जाएंगे जो उद्योग की वास्तविक मांगों के अनुरूप हों। इसका उद्देश्य युवाओं को रोजगार के बेहतर अवसर प्रदान करना और उद्योग को योग्य पेशेवर उपलब्ध कराना है।
परियोजना के अंतर्गत भारत और दक्षिण कोरिया में संयुक्त कार्यशालाएं भी आयोजित की जाएंगी, जिनमें उद्योग जगत, नीति-निर्माताओं और शैक्षणिक संस्थानों के प्रतिनिधि शामिल होंगे। इन कार्यशालाओं के माध्यम से ज्ञान और तकनीकी अनुभव का आदान-प्रदान होगा, जिससे दोनों देशों के बीच सहयोग और मजबूत होगा।
इसके अलावा, दोनों देश भारत में एक ‘शिपबिल्डिंग वर्कफोर्स डेवलपमेंट एंड टेक्नोलॉजी कोऑपरेशन सेंटर’ स्थापित करने पर भी विचार कर रहे हैं। यह केंद्र व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान करेगा और तकनीकी कौशल के विकास के साथ-साथ उत्पादकता बढ़ाने पर विशेष ध्यान देगा। यह पहल देश के समुद्री क्षेत्र को आधुनिक और प्रतिस्पर्धी बनाने में अहम भूमिका निभा सकती है।
सरकार का मानना है कि यह साझेदारी न केवल कौशल विकास को गति देगी, बल्कि भारत को वैश्विक शिपबिल्डिंग उद्योग में एक मजबूत स्थान दिलाने में भी मदद करेगी। इसके माध्यम से एक नई पीढ़ी के कुशल और तकनीकी रूप से सक्षम समुद्री पेशेवर तैयार किए जा सकेंगे।यह पहल भारत के समुद्री क्षेत्र के विकास के लिए एक महत्वपूर्ण कदम है, जो रोजगार सृजन, तकनीकी उन्नति और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को नई दिशा प्रदान करेगी।