श्रीलंका में कोयला आयात विवाद ने बड़ा राजनीतिक मोड़ ले लिया है, जहां ऊर्जा मंत्री Kumara Jayakody ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। यह इस्तीफा ऐसे समय आया है जब वह कुछ ही दिन पहले संसद में अविश्वास प्रस्ताव (no-confidence motion) से बचने में सफल रहे थे।
रिपोर्ट के अनुसार, यह इस्तीफा देश में कोयले की खरीद से जुड़े विवाद और कथित अनियमितताओं के बीच दिया गया है। आरोप है कि निम्न गुणवत्ता (low-quality) के कोयले की खरीद के कारण देश के ऊर्जा क्षेत्र को नुकसान हुआ और बिजली उत्पादन प्रभावित हुआ।
ऊर्जा मंत्री के साथ-साथ मंत्रालय के सचिव उदयंगा हेमापाला ने भी पद छोड़ दिया है। दोनों ने यह कदम इसलिए उठाया ताकि मामले की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच हो सके। श्रीलंका के राष्ट्रपति Anura Kumara Dissanayake ने इस पूरे मामले की जांच के लिए एक विशेष राष्ट्रपति आयोग (Presidential Commission) गठित किया है, जो वर्षों से हो रहे कोयला आयात की जांच करेगा।
दरअसल, विपक्ष ने ऊर्जा मंत्री पर आरोप लगाया था कि कोयले की खरीद में गड़बड़ी हुई है, जिससे देश को भारी आर्थिक नुकसान हुआ और राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा पर खतरा पैदा हुआ। हालांकि, संसद में हाल ही में लाए गए अविश्वास प्रस्ताव में सरकार ने बहुमत के दम पर इसे खारिज कर दिया था।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह मामला केवल राजनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा से भी जुड़ा है। श्रीलंका का प्रमुख कोयला आधारित पावर प्लांट—लक्षविजया (Lakvijaya)—देश की लगभग 40% बिजली जरूरत पूरी करता है। लेकिन घटिया कोयले के इस्तेमाल से इसकी उत्पादन क्षमता प्रभावित हुई, जिससे देश को अतिरिक्त ईंधन आयात करना पड़ा।
इस स्थिति के चलते श्रीलंका को आपातकालीन रूप से अतिरिक्त कोयला मंगवाना पड़ा और बिजली उत्पादन बनाए रखने के लिए महंगे ईंधनों जैसे डीजल और फर्नेस ऑयल का उपयोग बढ़ाना पड़ा। इससे देश की आर्थिक स्थिति पर और दबाव बढ़ गया, जो पहले से ही वित्तीय संकट से उबरने की कोशिश कर रहा है।
ऊर्जा मंत्री का यह इस्तीफा सरकार के लिए एक बड़ा झटका माना जा रहा है, खासकर इसलिए क्योंकि यह मौजूदा सरकार के कार्यकाल में पहला बड़ा इस्तीफा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह कदम सरकार की “भ्रष्टाचार के खिलाफ” छवि को बनाए रखने की कोशिश भी हो सकता है।
मंत्री ने अपने इस्तीफे में कहा कि वह चाहते हैं कि जांच पूरी तरह निष्पक्ष तरीके से हो और उनके पद पर बने रहने से जांच प्रभावित न हो। वहीं विपक्ष का कहना है कि यह मामला केवल इस्तीफे तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि जिम्मेदार लोगों पर सख्त कार्रवाई होनी चाहिए।
कुल मिलाकर, श्रीलंका में यह घटनाक्रम न केवल राजनीतिक अस्थिरता को दर्शाता है, बल्कि यह भी दिखाता है कि ऊर्जा संसाधनों के प्रबंधन में पारदर्शिता और जवाबदेही कितनी जरूरी है। आने वाले समय में जांच के नतीजे इस पूरे विवाद की दिशा तय करेंगे।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *