इंदौर में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ के समक्ष भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान ऐतिहासिक और पुरातात्विक साक्ष्यों को लेकर विस्तृत दलीलें पेश की गईं। इस दौरान तीन प्रमुख प्रकार के साक्ष्यों—साहित्यिक ग्रंथ, अभिलेखीय प्रमाण और स्थापत्य संबंधी संदर्भों—का हवाला दिया गया।
मामले में पक्षकार की ओर से यह तर्क रखा गया कि विवादित स्थल अपने मूल स्वरूप में एक मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र था, जिसकी स्थापना परमार काल में राजा भोज के समय मानी जाती है। दलीलों में कहा गया कि धार क्षेत्र उस समय केवल एक साधारण स्थान नहीं था, बल्कि संस्कृत शिक्षा का एक प्रमुख केंद्र था, जहाँ हिंदू, जैन और बौद्ध परंपराओं के विद्वान अध्ययन के लिए आते थे।
सुनवाई के दौरान यह भी बताया गया कि स्थल पर मौजूद कुछ अवशेष और शिलालेख इस ऐतिहासिक दावे को मजबूत करते हैं। विशेष रूप से ‘सरवबंधी’ प्रकार के शिलालेख और बड़े पत्थर के स्लैब को शिक्षा से जुड़े उपकरणों के रूप में प्रस्तुत किया गया, जिनका उपयोग संस्कृत व्याकरण और शिक्षा देने में किया जाता था।
इसके अलावा वाग्देवी (सरस्वती) की मूर्ति के आधार पर अंकित शिलालेख का उल्लेख किया गया, जिसे वर्तमान में लंदन स्थित ब्रिटिश म्यूजियम में संरक्षित बताया गया है। इस शिलालेख में मूर्ति के “प्रस्थापित” होने का उल्लेख है, जिसे राजा भोज के शासनकाल में विधिवत रूप से प्रतिष्ठित किया गया माना जाता है। दलील में कहा गया कि यह केवल मूर्ति स्थापना नहीं थी, बल्कि एक संगठित मंदिर व्यवस्था का प्रमाण है।
साथ ही 11वीं शताब्दी के ग्रंथ “समरांगण सूत्रधार” का हवाला देते हुए कहा गया कि यह ग्रंथ राजा भोज द्वारा वास्तुकला और निर्माण शैलियों पर आधारित था। तर्क यह था कि भोजशाला परिसर की संरचना इसी ग्रंथ में वर्णित वास्तु सिद्धांतों से मेल खाती है। इसमें केंद्रीय वेदी और दिशात्मक संरचना जैसी विशेषताओं का उल्लेख भी किया गया।
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्टों का भी संदर्भ दिया गया, जिसमें केंद्रीय ईंट संरचना को यज्ञ वेदी या हवन कुंड के रूप में वर्णित किया गया है। यह भी दावा किया गया कि परिसर में उपयोग की गई ईंटें एक ही भट्ठे में बनी प्रतीत होती हैं, जिससे यह संकेत मिलता है कि पूरा ढांचा एक ही योजना के तहत निर्मित हुआ था।
दलीलों में यह भी कहा गया कि मूर्तियों की बनावट, शिलालेखों की शैली और स्थापत्य समानताएँ परमार वंश की अन्य संरचनाओं से मेल खाती हैं। इसके आधार पर यह निष्कर्ष प्रस्तुत किया गया कि स्थल का मूल स्वरूप एक संगठित धार्मिक और शैक्षणिक केंद्र था।
मामले की सुनवाई आगे भी जारी रहेगी, जिसमें पक्षकारों की दलीलें प्रस्तुत की जाएंगी।

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