भारत का फार्मास्युटिकल सेक्टर तेजी से वैश्विक स्तर पर अपनी मजबूत पहचान बना रहा है और अब यह केवल सस्ती दवाओं का सप्लायर ही नहीं, बल्कि एक उभरता हुआ इनोवेशन हब बनने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। प्रधानमंत्री Narendra Modi ने हाल ही में इस क्षेत्र पर एक लेख साझा करते हुए भारत की बढ़ती क्षमता और वैश्विक भूमिका पर जोर दिया।
प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत लंबे समय से “फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड” के रूप में जाना जाता रहा है, लेकिन अब देश इस पहचान से आगे बढ़ते हुए नवाचार (innovation) और अनुसंधान (R&D) आधारित विकास की ओर बढ़ रहा है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि भारत अब केवल जेनेरिक दवाओं का उत्पादन ही नहीं कर रहा, बल्कि बायोलॉजिक्स, बायोसिमिलर्स और एडवांस्ड थेरेपी जैसे उच्च मूल्य वाले क्षेत्रों में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है।
सरकार द्वारा फार्मा सेक्टर को मजबूत बनाने के लिए कई नीतिगत कदम उठाए गए हैं। इनमें रिसर्च को बढ़ावा देना, निवेश आकर्षित करना और उद्योग-अकादमिक सहयोग को मजबूत करना शामिल है। ‘इंडिया फार्मा 2026’ जैसे कार्यक्रम इस दिशा में महत्वपूर्ण मंच प्रदान कर रहे हैं, जहां वैश्विक स्तर पर साझेदारी और रणनीति तैयार की जा रही है।
भारत की ताकत का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि देश दुनिया की लगभग 20% जेनेरिक दवाओं की आपूर्ति करता है और वैश्विक वैक्सीन मांग का करीब 70% पूरा करता है। यह न केवल भारत की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता को दर्शाता है, बल्कि स्वास्थ्य क्षेत्र में उसकी विश्वसनीयता को भी मजबूत करता है।
इसके अलावा, सरकार की कई योजनाएं इस सेक्टर को और मजबूत बना रही हैं। प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव (PLI), बल्क ड्रग पार्क और ‘Biopharma Shakti’ जैसी पहलें घरेलू उत्पादन बढ़ाने और आत्मनिर्भरता को मजबूत करने में मदद कर रही हैं। इन योजनाओं का उद्देश्य भारत को वैश्विक सप्लाई चेन में एक प्रमुख खिलाड़ी बनाना है।
साथ ही, Pradhan Mantri Bharatiya Jan Aushadhi Pariyojana जैसी योजनाएं आम लोगों को सस्ती और गुणवत्तापूर्ण दवाएं उपलब्ध कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच आसान हो रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में फार्मा सेक्टर भारत की अर्थव्यवस्था का एक प्रमुख स्तंभ बन सकता है। अनुमान है कि यह उद्योग 2030 तक 130 अरब डॉलर के स्तर तक पहुंच सकता है, जो इसकी तेज विकास दर को दर्शाता है।
हालांकि, चुनौतियां भी मौजूद हैं—जैसे अनुसंधान में अधिक निवेश की जरूरत, वैश्विक प्रतिस्पर्धा और सप्लाई चेन की जटिलताएं। लेकिन सरकार और उद्योग के संयुक्त प्रयासों से इन चुनौतियों को अवसर में बदला जा सकता है।

 

कुल मिलाकर, भारत का फार्मा सेक्टर अब एक नए चरण में प्रवेश कर रहा है, जहां वह केवल उत्पादन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि नवाचार और तकनीकी नेतृत्व के जरिए वैश्विक स्वास्थ्य प्रणाली में अपनी मजबूत भूमिका निभाएगा।

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