अमेरिका में बढ़ती महंगाई और पेट्रोल-डीजल की कीमतों ने सियासी हलचल तेज कर दी है। राष्ट्रपति Donald Trump के “इकोनॉमिक रीसेट” प्रयासों के बीच उनकी ही पार्टी रिपब्लिकन नेताओं में चिंता बढ़ती नजर आ रही है। खासतौर पर ईंधन की ऊंची कीमतें आगामी चुनावों से पहले एक बड़ा राजनीतिक मुद्दा बनती जा रही हैं।
रिपोर्ट के अनुसार, गैस की कीमतें ट्रंप प्रशासन के लिए सबसे बड़ी कमजोरी बन गई हैं। तेल की वैश्विक सप्लाई में बाधाओं और मध्य पूर्व में जारी तनाव के कारण ईंधन की कीमतें लगातार ऊंचे स्तर पर बनी हुई हैं।
ट्रंप प्रशासन ने इस स्थिति से निपटने के लिए कई कदम उठाए हैं। इनमें स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व से तेल जारी करना, शिपिंग नियमों में बदलाव करना और रूस तथा ईरान के तेल पर कुछ प्रतिबंधों को ढील देना शामिल है। इसके बावजूद कीमतों में कोई खास राहत नहीं मिली है और अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतें 90 डॉलर प्रति बैरल से ऊपर बनी हुई हैं।
इस बीच, ट्रंप ने “नो टैक्स ऑन टिप्स” जैसे कदमों के जरिए आम लोगों को राहत देने की कोशिश की है। इस योजना के तहत सर्विस सेक्टर में काम करने वाले कर्मचारियों को टैक्स में छूट दी जा रही है, जिससे उनकी आय बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है।
हालांकि, पार्टी के भीतर ही कई रिपब्लिकन नेताओं को डर है कि बढ़ती गैस कीमतें और महंगाई मतदाताओं को प्रभावित कर सकती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि ऊर्जा लागत बढ़ने से आम जनता पर सीधा असर पड़ता है, जिससे सरकार के खिलाफ असंतोष बढ़ सकता है।
ट्रंप ने खुद भी इस मुद्दे पर मिले-जुले संकेत दिए हैं। कभी उन्होंने कहा कि लोगों को कुछ समय तक ऊंची कीमतों का सामना करना पड़ सकता है, तो कभी यह दावा किया कि युद्ध समाप्त होते ही कीमतों में तेजी से गिरावट आएगी।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह स्थिति रिपब्लिकन पार्टी के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकती है, खासकर तब जब मध्यावधि चुनाव (midterms) नजदीक आ रहे हैं। ट्रंप प्रशासन इस मुद्दे को संतुलित करने की कोशिश कर रहा है, लेकिन बढ़ती लागत और वैश्विक अनिश्चितता के चलते हालात जटिल बने हुए हैं।
अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि व्हाइट हाउस के पास ऊर्जा कीमतों को नियंत्रित करने के सीमित विकल्प ही बचे हैं। अधिकांश समाधान अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और तेल आपूर्ति से जुड़े हैं, जो सीधे प्रशासन के नियंत्रण में नहीं हैं।
कुल मिलाकर, ट्रंप का “इकोनॉमिक रीसेट” प्लान एक तरफ टैक्स राहत और आर्थिक संदेश के जरिए जनता को साधने की कोशिश कर रहा है, वहीं दूसरी तरफ बढ़ती गैस कीमतें इस रणनीति के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभर रही हैं। आने वाले समय में यह साफ होगा कि क्या यह रणनीति राजनीतिक रूप से सफल होती है या नहीं।