अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया शुरुआती कारोबार में 16 पैसे की मजबूती के साथ 95.52 के स्तर पर पहुंच गया। इससे पहले रुपया अपने रिकॉर्ड निचले स्तर तक फिसल गया था, जिसके बाद बाजार में रिकवरी देखने को मिली। विदेशी मुद्रा बाजार में निवेशकों की नजर वैश्विक आर्थिक संकेतों, कच्चे तेल की कीमतों और अमेरिकी फेडरल रिजर्व की नीतियों पर बनी हुई है।
मुद्रा बाजार विशेषज्ञों के अनुसार, शुरुआती कारोबार में डॉलर की मांग में कुछ नरमी और घरेलू शेयर बाजारों में स्थिरता के कारण रुपये को समर्थन मिला। हालांकि वैश्विक स्तर पर डॉलर अभी भी मजबूत बना हुआ है। डॉलर इंडेक्स, जो छह प्रमुख मुद्राओं के मुकाबले अमेरिकी मुद्रा की ताकत को दर्शाता है, 98.30 पर कारोबार करता दिखाई दिया, जिसमें 0.01% की मामूली बढ़त दर्ज की गई।
विशेषज्ञों का कहना है कि पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव, कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव और विदेशी निवेशकों की गतिविधियां भारतीय मुद्रा की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा रही हैं। भारत कच्चे तेल का बड़ा आयातक देश है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होने पर रुपये पर दबाव बढ़ सकता है।
विदेशी संस्थागत निवेशकों की बिकवाली और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के चलते हाल के दिनों में रुपये में कमजोरी देखी गई थी। हालांकि भारतीय रिजर्व बैंक की निगरानी और बाजार में डॉलर की उपलब्धता ने अत्यधिक गिरावट को सीमित रखने में मदद की है। विश्लेषकों का मानना है कि आने वाले दिनों में अमेरिकी आर्थिक आंकड़े और ब्याज दरों से जुड़े संकेत मुद्रा बाजार की चाल को प्रभावित कर सकते हैं।
आर्थिक जानकारों के अनुसार, रुपये में उतार-चढ़ाव का असर आयात-निर्यात कारोबार, विदेशी निवेश और आम उपभोक्ताओं पर भी पड़ता है। कमजोर रुपया आयातित वस्तुओं को महंगा बना सकता है, जबकि निर्यातकों को कुछ राहत मिल सकती है। फिलहाल बाजार की नजर वैश्विक संकेतों और घरेलू आर्थिक गतिविधियों पर बनी हुई है।