केरल के मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन, जो राज्य के वित्त मंत्री का भी कार्यभार संभाल रहे हैं, 19 जून को यूडीएफ सरकार का पहला बजट पेश करेंगे। इस बजट से उम्मीद की जा रही है कि यह जनता के हितों और राज्य की चुनौतीपूर्ण वित्तीय स्थिति के बीच संतुलन बनाने का प्रयास करेगा।
सत्ता में आने के बाद कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूडीएफ सरकार ने खुद को संवेदनशील और जनकल्याणकारी सरकार के रूप में पेश करने की कोशिश की है। इसकी झलक सरकार के शुरुआती फैसलों में देखने को मिली, जिनमें आशा कार्यकर्ताओं का मासिक मानदेय बढ़ाकर 12,000 रुपये करना और आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं, सहायिकाओं तथा आया के मासिक पारिश्रमिक में 1,000 रुपये की बढ़ोतरी शामिल है।
मुख्यमंत्री कार्यालय (सीएमओ) के सूत्रों के अनुसार, मुख्यमंत्री सतीशन का पहला बजट भी इसी जनहितकारी सोच को आगे बढ़ाएगा। हालांकि, अर्थशास्त्रियों का मानना है कि राज्य की मौजूदा वित्तीय स्थिति सरकार को बड़े खर्च वाले फैसले लेने की सीमित गुंजाइश देती है।
सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज के पूर्व निदेशक और विकास अर्थशास्त्री के. पी. कन्नन का कहना है कि सरकार के शुरुआती फैसलों से जनता में सकारात्मक संदेश गया है। लेकिन उनका मानना है कि नया बजट पिछले शासनकाल में पारित बजट से बहुत अलग नहीं हो सकता, क्योंकि राज्य का अधिकांश खर्च पहले से तय और अनिवार्य मदों में बंधा हुआ है।
कन्नन के अनुसार, महिलाओं को केएसआरटीसी की साधारण बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा देने की सरकारी योजना पर ही हर साल 800 करोड़ रुपये से अधिक खर्च होने का अनुमान है। इसके अलावा, नई सरकार को पिछली सरकार से मिली वित्तीय देनदारियों का भी सामना करना होगा।
यूडीएफ सरकार द्वारा हाल ही में जारी केरल की वित्तीय स्थिति पर श्वेत पत्र राज्य की गंभीर आर्थिक चुनौतियों की ओर इशारा करता है। रिपोर्ट के अनुसार, राज्य पर कुल 5.07 लाख करोड़ रुपये का सार्वजनिक कर्ज है, जबकि सरकार की कुल राजस्व प्राप्तियों का लगभग 77 प्रतिशत हिस्सा वेतन, पेंशन और ब्याज भुगतान जैसे अनिवार्य खर्चों में ही चला जाता है।
रिपोर्ट में राज्य के खजाने पर बढ़ते दबाव, महंगाई भत्ते (DA) और महंगाई राहत (DR) के लंबित बकाये, साथ ही ठेकेदारों और वित्तीय संस्थानों के बकाया भुगतानों का भी उल्लेख किया गया है।
कन्नन का मानना है कि लंबित डीए और डीआर बकाये का भुगतान नई सरकार के लिए सबसे कठिन फैसलों में से एक होगा। उनके अनुसार, सरकार वित्तीय दबाव को देखते हुए इनका भुगतान किस्तों में कर सकती है या फिर इसे कुछ समय के लिए टाल सकती है।
उन्होंने यह भी कहा कि मौजूदा परिस्थितियों में केरल एक और वेतन संशोधन का खर्च वहन करने की स्थिति में नहीं है। हालांकि पिछली सरकार ने वेतन आयोग का गठन कर उसे तीन महीने में रिपोर्ट देने को कहा था, लेकिन नई सरकार उस निर्णय को लागू करने के लिए बाध्य नहीं है।
राज्य की वित्तीय स्थिति को मजबूत करने के लिए कन्नन ने कुछ कठिन लेकिन आवश्यक सुधारों का सुझाव दिया है। इनमें सरकारी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति आयु बढ़ाकर 60 वर्ष करना शामिल है, जिससे उनके अनुसार हर साल लगभग 6,400 करोड़ रुपये की बचत हो सकती है। इससे पेंशन का बोझ कम होगा और नई भर्तियों में भी देरी होगी।
उन्होंने सेवा के दौरान हर वर्ष मिलने वाली अर्जित अवकाश नकदीकरण (लीव एनकैशमेंट) की व्यवस्था समाप्त कर इसे केवल सेवानिवृत्ति के समय तक सीमित करने की भी सलाह दी। उनके अनुसार, इससे राज्य को हर साल लगभग 3,000 करोड़ रुपये की बचत हो सकती है।
कन्नन ने यह भी कहा कि केरल को अपनी कर वसूली प्रणाली को अधिक प्रभावी बनाने की जरूरत है। उनके मुताबिक, राज्य वर्तमान में प्रत्येक 100 रुपये की आय पर केवल 7.8 रुपये कर के रूप में जुटा रहा है, जबकि पहले यह आंकड़ा लगभग 12 रुपये तक रहता था। उनका मानना है कि कर संग्रह की दक्षता को कम से कम 10 प्रतिशत तक पहुंचाना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।
गुलाटी इंस्टीट्यूट ऑफ फाइनेंस एंड टैक्सेशन के पूर्व फैकल्टी सदस्य जोस सेबेस्टियन का कहना है कि गरीबों पर अतिरिक्त बोझ डाले बिना भी सरकार राजस्व बढ़ा सकती है।
उन्होंने स्थानीय निकायों के साथ समझौते के जरिए संपत्ति कर संग्रह की व्यवस्था अपने हाथ में लेने, कुछ स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं पर उपयोग शुल्क बढ़ाने, बिजली शुल्क में वृद्धि करने और सरकारी परिसंपत्तियों का बेहतर उपयोग कर अतिरिक्त आय जुटाने जैसे विकल्प सुझाए हैं।
सेबेस्टियन का यह भी मानना है कि भविष्य में पेंशन सुधार अपरिहार्य होंगे। उनके अनुसार, जरूरत-आधारित सार्वभौमिक पेंशन प्रणाली अपनाना राज्य की दीर्घकालिक वित्तीय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।
मुख्यमंत्री वी. डी. सतीशन के लिए यह बजट केवल आय-व्यय का दस्तावेज नहीं होगा, बल्कि यह उनकी सरकार की प्रशासनिक सोच और आर्थिक दृष्टिकोण की पहली बड़ी परीक्षा भी होगा। अब सभी की नजर इस बात पर है कि क्या नई सरकार जनकल्याण और वित्तीय अनुशासन के बीच संतुलन बनाते हुए राज्य को स्थायी आर्थिक दिशा दे पाएगी।