भारतीय रुपया मंगलवार को एक महीने में अपनी सबसे बड़ी एकदिनी गिरावट दर्ज करते हुए लगभग 0.9% टूटकर 95.31 प्रति अमेरिकी डॉलर के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। यह गिरावट मार्च 27 के बाद की सबसे तेज एकदिनी कमजोरी मानी जा रही है, जिससे घरेलू मुद्रा बाजार में दबाव और बढ़ गया है।
यह गिरावट मुख्य रूप से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल के कारण देखने को मिली, जो US-Iran भू-राजनीतिक तनाव के चलते और बढ़ गई है। ब्रेंट क्रूड की कीमतों में तेजी से भारत जैसे आयात-निर्भर देशों पर आयात बिल बढ़ने की आशंका गहरा गई है।
विदेशी मुद्रा बाजार में रुपये पर दबाव इसलिए भी बढ़ा क्योंकि तेल आयातकों की डॉलर मांग अचानक बढ़ गई, जिससे विदेशी मुद्रा की निकासी तेज हो गई। इससे चालू खाते के घाटे (CAD) और महंगाई पर भी असर पड़ने की चिंता जताई जा रही है।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था के लिए कच्चे तेल की कीमतें एक प्रमुख संवेदनशील कारक हैं। जब वैश्विक तेल कीमतें बढ़ती हैं, तो देश का आयात खर्च बढ़ता है और डॉलर की मांग बढ़ने से रुपया और कमजोर होता है। यही वजह है कि मौजूदा भू-राजनीतिक तनाव का सीधा असर मुद्रा बाजार पर दिख रहा है।
मुद्रा विश्लेषकों के अनुसार, लगातार विदेशी पोर्टफोलियो निवेश (FPI) आउटफ्लो और वैश्विक जोखिम से बचने की प्रवृत्ति भी रुपये पर दबाव बना रही है। इसके साथ ही, अन्य एशियाई मुद्राओं में कमजोरी ने भी भारतीय रुपये की गिरावट को और तेज किया।
हालांकि भारतीय विदेशी मुद्रा भंडार अभी मजबूत स्थिति में बना हुआ है, लेकिन बाजार विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि यदि तेल की कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं, तो रुपये पर दबाव जारी रह सकता है। इससे आयात महंगा होगा और महंगाई का जोखिम बढ़ेगा।
सरकार और केंद्रीय बैंक स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं और जरूरत पड़ने पर मुद्रा स्थिरता के लिए हस्तक्षेप की संभावना भी बनी रहती है।