भारतीय रुपये ने शुक्रवार को मजबूती दिखाते हुए एक सप्ताह के उच्च स्तर को छू लिया, जिसके पीछे भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) के सक्रिय हस्तक्षेप को प्रमुख कारण माना जा रहा है। हाल के दिनों में लगातार दबाव झेल रहे रुपये को केंद्रीय बैंक के कदमों से राहत मिली है, जिससे बाजार में भरोसा लौटा है।
रिपोर्ट्स के अनुसार, RBI ने राज्य संचालित तेल कंपनियों द्वारा डॉलर की भारी खरीद को सीमित करने के लिए कदम उठाए हैं। तेल कंपनियां आमतौर पर कच्चे तेल के आयात के लिए बड़े पैमाने पर डॉलर खरीदती हैं, जिससे रुपये पर दबाव बढ़ता है। इस दबाव को कम करने के लिए केंद्रीय बैंक ने विशेष व्यवस्थाएं लागू कीं, जिससे डॉलर की मांग में कमी आई और रुपये को सहारा मिला।
इन उपायों के बाद रुपया करीब 0.3% मजबूत होकर 92.92 प्रति डॉलर के आसपास बंद हुआ, जबकि दिन के दौरान यह 92.66 के स्तर तक पहुंच गया—जो एक सप्ताह का उच्च स्तर है। हाल के समय में रुपये ने अपने रिकॉर्ड निचले स्तर से लगभग 2% की रिकवरी भी दर्ज की है, जो यह दिखाता है कि RBI की रणनीति का असर दिखने लगा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि RBI ने पुराने “क्राइसिस मैनेजमेंट टूल्स” का उपयोग करते हुए बाजार में स्थिरता लाने की कोशिश की है। इसमें तेल कंपनियों को स्पॉट मार्केट से डॉलर खरीदने के बजाय वैकल्पिक चैनलों का उपयोग करने के निर्देश देना शामिल है। इससे विदेशी मुद्रा बाजार में अचानक बढ़ने वाली मांग को नियंत्रित किया जा सका है।
हालांकि, यह मजबूती स्थायी नहीं मानी जा रही है। विश्लेषकों के अनुसार, रुपये पर अभी भी कई संरचनात्मक दबाव बने हुए हैं। इनमें बढ़ती कच्चे तेल की कीमतें, विदेशी निवेश (FPI) का बाहर जाना और चालू खाते (current account) पर दबाव प्रमुख हैं। यही कारण है कि 2026 में रुपया एशिया की कमजोर प्रदर्शन करने वाली प्रमुख मुद्राओं में शामिल रहा है।
इसके अलावा, वैश्विक कारकों का भी बड़ा असर बना हुआ है। खासकर मध्य पूर्व में तनाव और ईरान से जुड़े भू-राजनीतिक जोखिम तेल कीमतों को प्रभावित कर रहे हैं, जिससे भारत जैसे आयात-निर्भर देशों की मुद्रा पर दबाव बढ़ता है।
बाजार विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले दिनों में रुपये की दिशा काफी हद तक कच्चे तेल की कीमतों, विदेशी पूंजी प्रवाह और RBI की आगे की रणनीति पर निर्भर करेगी। यदि वैश्विक हालात स्थिर होते हैं और डॉलर की मांग नियंत्रित रहती है, तो रुपये को और मजबूती मिल सकती है।
कुल मिलाकर, RBI के त्वरित कदमों ने फिलहाल रुपये को गिरावट से उबारने में मदद की है और बाजार में स्थिरता लाई है। लेकिन दीर्घकालिक मजबूती के लिए भारत को अपने बाहरी आर्थिक कारकों—जैसे ऊर्जा आयात और पूंजी प्रवाह—को संतुलित करना होगा।